श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.38

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वृत्तान्तः श्रूयते सर्वैः किञ्चिन्‍निश्चित्य नोच्यते।

असाध्यं केचन प्रोचुर्दुर्ज्ञेयमिति चापरे।

मूकीभूतास्तथान्ये तु कियन्तस्तु पलायिताः॥ ३८

vṛttāntaḥ śrūyate sarvaiḥ kiñcinniścitya nocyate|

asādhyaṃ kecana procurdurjñeyamiti cāpare|

mūkībhūtāstathānye tu kiyantastu palāyitāḥ|| 38

अर्थ

उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किंतु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्चित उत्तर न देता। किन्हींने उसे असाध्य बताया; कोई बोले—‘इसका ठीक-ठीक पता लगना ही कठिन है।’ कोई सुनकर चुप रह गये और कोई-कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल-टूलकर खिसक गये॥ ३८॥

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