स्वयं योगिराज नारदको भी जिसका ज्ञान नहीं है, उसे दूसरे संसारी लोग कैसे बता सकते हैं?’॥ ४१॥
योगिना नारदेनापि स्वयं न ज्ञायते तु यत्।
तत्कथं शक्यते वक्तुमितरैरिह मानुषैः॥ ४१
स्वयं योगिराज नारदको भी जिसका ज्ञान नहीं है, उसे दूसरे संसारी लोग कैसे बता सकते हैं?’॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 44) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/41/