श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.50

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहो भाग्यस्य योगेन दर्शनं भवतामिह।

अनुग्रहस्तु कर्तव्यो मयि दीने दयापरैः॥ ५०

aho bhāgyasya yogena darśanaṃ bhavatāmiha|

anugrahastu kartavyo mayi dīne dayāparaiḥ|| 50

अर्थ

धन्य है, इस समय आपका दर्शन बड़े सौभाग्यसे ही हुआ है। मैं बहुत दीन हूँ और आपलोग स्वभावसे ही दयालु हैं; इसलिये मुझपर आपको अवश्य कृपा करनी चाहिये॥ ५०॥

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