श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.27

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तावत्संसारचक्रेऽस्मिन् भ्रमतेऽज्ञानतः पुमान्।

यावत्कर्णगता नास्ति शुकशास्त्रकथा क्षणम्॥ २७

tāvatsaṃsāracakre'smin bhramate'jñānataḥ pumān|

yāvatkarṇagatā nāsti śukaśāstrakathā kṣaṇam|| 27

अर्थ

यह जीव तभीतक अज्ञानवश इस संसारचक्रमें भटकता है, जबतक क्षणभरके लिये भी कानोंमें इस शुकशास्त्रकी कथा नहीं पड़ती॥ २७॥✎ 1567

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1567 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शुकशास्त्र-की → शुकशास्त्रकी

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