श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.12

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

सत्येन हीनाः पितृमातृदूषकास्तृष्णाकुलाश्चाश्रमधर्मवर्जिताः। ✎ 1496

ये दाम्भिका मत्सरिणोऽपि हिंसकाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनन्ति ते॥ १२

satyena hīnāḥ pitṛmātṛdūṣakāstṛṣṇākulāścāśramadharmavarjitāḥ|

ye dāmbhikā matsariṇo'pi hiṃsakāḥ saptāhayajñena kalau punanti te|| 12

अर्थ

जो सत्यसे च्युत, माता-पिताकी निन्दा करनेवाले, तृष्णाके मारे व्याकुल, आश्रमधर्मसे रहित, दम्भी, दूसरोंकी उन्‍नति देखकर कुढ़नेवाले और दूसरोंको दुःख देनेवाले हैं, वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1496 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पितृमातृदूषका- स्तृष्णाकुलाश्चाश्रमधर्मवर्जिता:। → पितृमातृदूषकास्तृष्णाकुलाश्चाश्रमधर्मवर्जिताः।

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