श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.74

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

असारः खलु संसारो दुःखरूपी विमोहकः।

सुतः कस्य धनं कस्य स्नेहवाञ्ज्वलतेऽनिशम्॥ ७४

asāraḥ khalu saṃsāro duḥkharūpī vimohakaḥ|

sutaḥ kasya dhanaṃ kasya snehavāñjvalate'niśam|| 74

अर्थ

वे बोले,‘पिताजी! यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुःखरूप और मोहमें डालनेवाला है। पुत्र किसका? धन किसका? स्नेहवान् पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है॥ ७४॥

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