इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे॥ २०॥
एवं भ्रमन् स गोकर्णः स्वपुरं समुपेयिवान्।
रात्रौ गृहाङ्गणे स्वप्तुमागतोऽलक्षितः परैः॥ २०
इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 64) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/20/