॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.21
तत्र सुप्तं स विज्ञाय धुन्धुकारी स्वबान्धवम्।
निशीथे दर्शयामास महारौद्रतरं वपुः॥ २१
tatra suptaṃ sa vijñāya dhundhukārī svabāndhavam|
niśīthe darśayāmāsa mahāraudrataraṃ vapuḥ|| 21
अर्थ
वहाँ अपने भाईको सोया देख आधी रातके समय धुन्धुकारीने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया॥ २१॥ वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता। अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ॥ २२॥