श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.27

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

प्रेत उवाच

अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीति नामतः।

स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया॥ २७

ahaṃ bhrātā tvadīyo'smi dhundhukārīti nāmataḥ|

svakīyenaiva doṣeṇa brahmatvaṃ nāśitaṃ mayā|| 27

अर्थ

प्रेत बोला—‘मैं तुम्हारा भाई हूँ। मेरा नाम है धुन्धुकारी। मैंने अपने ही दोषसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया॥ २७॥

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