गोकर्णने कहा—भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है—मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए?॥ ३१॥
त्वदर्थं तु गयापिण्डो मया दत्तो विधानतः।
तत्कथं नैव मुक्तोऽसि ममाश्चर्यमिदं महत्॥ ३१
गोकर्णने कहा—भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है—मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए?॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 65) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/31/