॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.32
गयाश्राद्धान्न मुक्तिश्चेदुपायो नापरस्त्विह।
किं विधेयं मया प्रेत तत्त्वं वद सविस्तरम्॥ ३२
gayāśrāddhānna muktiścedupāyo nāparastviha|
kiṃ vidheyaṃ mayā preta tattvaṃ vada savistaram|| 32
अर्थ
यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है। अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो—मुझे अब क्या करना चाहिये?॥ ३२॥