श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.53

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी।

सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः॥ ५३

dhanyā bhāgavatī vārtā pretapīḍāvināśinī|

saptāho'pi tathā dhanyaḥ kṛṣṇalokaphalapradaḥ|| 53

अर्थ

यह प्रेतपीड़ाका नाश करनेवाली श्रीमद्भागवतकी कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचन्द्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-पारायण भी धन्य है!॥ ५३॥ जब सप्ताहश्रवणका योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते हैं कि अब यह भागवतकी कथा जल्दी ही हमारा अन्त कर देगी॥ ५४॥ जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी—सब तरहकी लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताहश्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े—सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है॥ ५५॥

यह व्याख्या श्लोक PRE.5.53 से PRE.5.55 तककी एक साथ है।

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