श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.55

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम्।

श्रवणं विदहेत्पापं पावकः समिधो यथा॥ ५५

ārdraṃ śuṣkaṃ laghu sthūlaṃ vāṅmanaḥ karmabhiḥ kṛtam|

śravaṇaṃ vidahetpāpaṃ pāvakaḥ samidho yathā|| 55

अर्थ

जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी—सब तरहकी लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताहश्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े—सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है॥ ५५॥

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