॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.59
जराशोकविपाकार्तं रोगमन्दिरमातुरम्।
दुष्पूरं दुर्धरं दुष्टं सदोषं क्षणभङ्गुरम्॥ ५९
jarāśokavipākārtaṃ rogamandiramāturam|
duṣpūraṃ durdharaṃ duṣṭaṃ sadoṣaṃ kṣaṇabhaṅguram|| 59
अर्थ
वृद्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाममें दुःखमय ही है, रोगोंका तो घर ही ठहरा। यह निरन्तर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है, कभी इसकी तृप्ति नहीं होती। इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है; इसके रोम-रोममें दोष भरे हुए हैं और नष्ट होनेमें इसे एक क्षण भी नहीं लगता॥ ५९॥