जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी॥ ६१॥
यत्प्रातः संस्कृतं चान्नं सायं तच्च विनश्यति।
तदीयरससम्पुष्टे काये का नाम नित्यता॥ ६१
जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रससे पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 67) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/61/