॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.37
लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम्॥ ३७
lokavittadhanāgāraputracintāṃ vyudasya ca|
kathācittaḥ śuddhamatiḥ sa labhetphalamuttamam|| 37
अर्थ
जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिन्ता छोड़कर शुद्धचित्तसे केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है॥ ३७॥✎ 1570