॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.54
एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत्।
जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकाङ्क्षिभिः॥ ५४
evaṃ kṛtvā vratavidhimudyāpanamathācaret|
janmāṣṭamīvratamiva kartavyaṃ phalakāṅkṣibhiḥ|| 54
अर्थ
इस प्रकार इस व्रतकी विधियोंका पालन करके फिर उद्यापन करे। जिन्हें इसके विशेष फलकी इच्छा हो, वे जन्माष्टमीव्रतके समान ही इस कथाव्रतका उद्यापन करें॥ ५४॥ किन्तु जो भगवान्के अकिंचन भक्त हैं, उनके लिये उद्यापनका कोई आग्रह नहीं है। वे श्रवणसे ही पवित्र हैं; क्योंकि वे तो निष्काम भगवद्भक्त हैं॥ ५५॥