॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.66
सम्पूज्यावाहनाद्यैस्तदुपचारैः सदक्षिणम्।
वस्त्रभूषणगन्धाद्यैः पूजिताय यतात्मने॥ ६६
sampūjyāvāhanādyaistadupacāraiḥ sadakṣiṇam|
vastrabhūṣaṇagandhādyaiḥ pūjitāya yatātmane|| 66
अर्थ
सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको—उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर—दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे॥ ६५-६६॥