॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.1.20
गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं व्रज उच्यते।
सदानन्दं परं ज्योतिर्मुक्तानां पदमव्ययम्॥ २०
guṇātītaṃ paraṃ brahma vyāpakaṃ vraja ucyate|
sadānandaṃ paraṃ jyotirmuktānāṃ padamavyayam|| 20
अर्थ
सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंसे अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक है। इसलिये उसे ‘व्रज’ कहते हैं। वह सदानन्दस्वरूप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है। जीवन्मुक्त पुरुष उसीमें स्थित रहते हैं॥ २०॥