श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

चन्द्रिकाविशदस्मेरैः सारुणापांगवीक्षितैः।

स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालकाः॥ ५०

candrikāviśadasmeraiḥ sāruṇāpāṃgavīkṣitaiḥ|

svakārthānāmiva rajaḥsattvābhyāṃ sraṣṭṛpālakāḥ|| 50

अर्थ

उनकी मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी। ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्तजनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं॥ ५०॥✎ 1661

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1661 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्त-जनोंके → भक्तजनोंके

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