उन्हें अलग-अलग अणिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ, माया-विद्या आदि विभूतियाँ और महत्तत्त्व आदि चौबीसों तत्त्व चारों ओरसे घेरे हुए हैं॥ ५२॥✎ 1925
अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभिः ।
चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः परीता महदादिभिः॥ ५२
उन्हें अलग-अलग अणिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ, माया-विद्या आदि विभूतियाँ और महत्तत्त्व आदि चौबीसों तत्त्व चारों ओरसे घेरे हुए हैं॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 218) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/13/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1925 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): एक-रस → एकरस