श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.19.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अजा गावो महिष्यश्‍च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम्।

इषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥ २

ajā gāvo mahiṣyaśca nirviśantyo vanād vanam|

iṣīkāṭavīṃ nirviviśuḥ krandantyo dāvatarṣitāḥ|| 2

अर्थ

उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें एक वनसे दूसरे वनमें होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मीके तापसे व्याकुल हो गयीं। वे बेसुध-सी होकर अन्तमें डकराती हुई मुंजाटवी (सरकंडोंके वन) में घुस गयीं॥ २॥✎ 1816

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1816 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): हरी हरी → हरी-हरी

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