जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालोंने देखा कि हमारे पशुओंका तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है, तब उन्हें अपने खेल-कूदपर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज-बीन करनेपर भी अपनी गौओंका पता न लगा सके॥ ३॥✎ 1816
तेऽपश्यन्तः पशून् गोपाः कृष्णरामादयस्तदा।
जातानुतापा न विदुर्विचिन्वन्तो गवां गतिम्॥ ३
जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालोंने देखा कि हमारे पशुओंका तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है, तब उन्हें अपने खेल-कूदपर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज-बीन करनेपर भी अपनी गौओंका पता न लगा सके॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.19.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 256) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/19/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1816 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): हरी हरी → हरी-हरी