श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) · अध्याय 19

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 256–258

श्लोक-सूची
पृष्ठ 256

श्रीशुक उवाच

क्रीडासक्तेषु गोपेषु तद्गावो दूरचारिणीः।

स्वैरं चरन्त्यो विविशुस्तृणलोभेन गह्वरम्॥ १10.19.1

अजा गावो महिष्यश्‍च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम्।

इषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥ २10.19.2

तेऽपश्यन्तः पशून् गोपाः कृष्णरामादयस्तदा।

जातानुतापा न विदुर्विचिन्वन्तो गवां गतिम्॥ ३10.19.3

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उस समय जब ग्वालबाल खेल-कूदमें लग गये, तब उनकी गौएँ बेरोक-टोक चरती हुई बहुत दूर निकल गयीं और हरी-हरी घासके लोभसे एक गहन वनमें घुस गयीं॥ १॥ उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें एक वनसे दूसरे वनमें होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मीके तापसे व्याकुल हो गयीं। वे बेसुध-सी होकर अन्तमें डकराती हुई मुंजाटवी (सरकंडोंके वन) में घुस गयीं॥ २॥ जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालोंने देखा कि हमारे पशुओंका तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है, तब उन्हें अपने खेल-कूदपर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज-बीन करनेपर भी अपनी गौओंका पता न लगा सके॥ ३॥ ✎ 1816

पृष्ठ 257

तृणैस्तत्खुरदच्छिन्‍नैर्गोष्पदैरंकितैर्गवाम् ।

मार्गमन्वगमन् सर्वे नष्टाजीव्या विचेतसः॥ ४ 10.19.4

मुंजाटव्यां भ्रष्टमार्गं क्रन्दमानं स्वगोधनम्।

सम्प्राप्य तृषिताः श्रान्तास्ततस्ते संन्यवर्तयन्॥ ५10.19.5

ता आहूता भगवता मेघगम्भीरया गिरा।

स्वनाम्‍नां निनदं श्रुत्वा प्रतिनेदुः प्रहर्षिताः॥ ६10.19.6

पृष्ठ 257

गौएँ ही तो व्रजवासियोंकी जीविकाका साधन थीं। उनके न मिलनेसे वे अचेत-से हो रहे थे। अब वे गौओंके खुर और दाँतोंसे कटी हुई घास तथा पृथ्वीपर बने हुए खुरोंके चिह्नोंसे उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े॥ ४॥ अन्तमें उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवीमें रास्ता भूलकर डकरा रही हैं। उन्हें पाकर वे लौटानेकी चेष्टा करने लगे। उस समय वे एकदम थक गये थे और उन्हें प्यास भी बड़े जोरसे लगी हुई थी। इससे वे व्याकुल हो रहे थे॥ ५॥ उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी मेघके समान गम्भीर वाणीसे नाम ले-लेकर गौओंको पुकारने लगे। गौएँ अपने नामकी ध्वनि सुनकर बहुत हर्षित हुईं। वे भी उत्तरमें हुंकारने और रँभाने लगीं॥ ६॥

ततः समन्ताद् वनधूमकेतु-

र्यदृच्छयाभूत् क्षयकृद् वनौकसाम्।

समीरितः सारथिनोल्बणोल्मुकै-

र्विलेलिहानः स्थिरजंगमान् महान्॥ ७10.19.7

तमापतन्तं परितो दवाग्‍निं

गोपाश्‍च गावः प्रसमीक्ष्य भीताः।

ऊचुश्‍च कृष्णं सबलं प्रपन्‍ना

यथा हरिं मृत्युभयार्दिता जनाः॥ ८ 10.19.8

कृष्ण कृष्ण महावीर हे रामामितविक्रम।

दावाग्‍निना दह्यमानान् प्रपन्‍नांस्त्रातुमर्हथः॥ ९10.19.9

नूनं त्वद्बान्धवाः कृष्ण न चार्हन्त्यवसीदितुम्।

वयं हि सर्वधर्मज्ञ त्वन्‍नाथास्त्वत्परायणाः॥ १०10.19.10

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् उन गायोंको पुकार ही रहे थे कि उस वनमें सब ओर अकस्मात् दावाग्‍नि लग गयी, जो वनवासी जीवोंका काल ही होती है। साथ ही बड़े जोरकी आँधी भी चलकर उस अग्‍निके बढ़नेमें सहायता देने लगी। इससे सब ओर फैली हुई वह प्रचण्ड अग्‍नि अपनी भयंकर लपटोंसे समस्त चराचर जीवोंको भस्मसात् करने लगी॥ ७॥ जब ग्वालों और गौओंने देखा कि दावानल चारों ओरसे हमारी ही ओर बढ़ता आ रहा है, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गये। और मृत्युके भयसे डरे हुए जीव जिस प्रकार भगवान्‌की शरणमें आते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजीके शरणापन्‍न होकर उन्हें पुकारते हुए बोले—॥ ८॥ ‘महावीर श्रीकृष्ण! प्यारे श्रीकृष्ण! परम बलशाली बलराम! हम तुम्हारे शरणागत हैं। देखो, इस समय हम दावानलसे जलना ही चाहते हैं। तुम दोनों हमें इससे बचाओ॥ ९॥ श्रीकृष्ण! जिनके तुम्हीं भाई-बन्धु और सब कुछ हो, उन्हें तो किसी प्रकारका कष्ट नहीं होना चाहिये। सब धर्मोंके ज्ञाता श्यामसुन्दर! तुम्हीं हमारे एकमात्र रक्षक एवं स्वामी हो; हमें केवल तुम्हारा ही भरोसा है’॥ १०॥

पृष्ठ 256

श्रीशुक उवाच

वचो निशम्य कृपणं बन्धूनां भगवान् हरिः।

निमीलयत मा भैष्ट लोचनानीत्यभाषत॥ ११ 10.19.11

पृष्ठ 258

तथेति मीलिताक्षेषु भगवानग्‍निमुल्बणम्।

पीत्वा मुखेन तान् कृच्छ्राद् योगाधीशो व्यमोचयत्॥ १२ 10.19.12

ततश्‍च तेऽक्षीण्युन्मील्य पुनर्भाण्डीरमापिताः।

निशाम्य विस्मिता आसन्‍नात्मानं गाश्‍च मोचिताः॥ १३10.19.13

कृष्णस्य योगवीर्यं तद् योगमायानुभावितम्।

दावा‌ग्‍नेरात्मनः क्षेमं वीक्ष्य ते मेनिरेऽमरम्॥ १४10.19.14

पृष्ठ 257

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—अपने सखा ग्वाल-बालोंके ये दीनतासे भरे वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘डरो मत, तुम अपनी आँखें बंद कर लो’॥ ११॥ भगवान्‌की आज्ञा सुनकर उन ग्वालबालोंने कहा ‘बहुत अच्छा’ और अपनी आँखें मूँद लीं। तब योगेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने उस भयंकर आगको अपने मुँहसे पी लिया* और इस प्रकार उन्हें उस घोर संकटसे छुड़ा दिया॥ १२॥ इसके बाद जब ग्वालबालोंने अपनी-अपनी आँखें खोलकर देखा तब अपनेको भाण्डीर वटके पास पाया। इस प्रकार अपने-आपको और गौओंको दावानलसे बचा देख वे ग्वालबाल बहुत ही विस्मित हुए॥ १३॥ श्रीकृष्णकी इस योगसिद्धि तथा योगमायाके प्रभावको एवं दावानलसे अपनी रक्षाको देखकर उन्होंने यही समझा कि श्रीकृष्ण कोई देवता हैं॥ १४॥✎ 1932

गाः सन्‍निवर्त्य सायाह्ने सहरामो जनार्दनः।

वेणुं विरणयन् गोष्ठमगाद् गोपैरभिष्टुतः॥ १५10.19.15

गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने।

क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ १६10.19.16

पृष्ठ 258

परीक्षित्! सायंकाल होनेपर बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्णने गौएँ लौटायीं और वंशी बजाते हुए उनके पीछे-पीछे व्रजकी यात्रा की। उस समय ग्वालबाल उनकी स्तुति करते आ रहे थे॥ १५॥ इधर व्रजमें गोपियोंको श्रीकृष्णके बिना एक-एक क्षण सौ-सौ युगके समान हो रहा था। जब भगवान् श्रीकृष्ण लौटे तब उनका दर्शन करके वे परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गयीं॥ १६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
दावाग्‍निपानं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    १. भगवान् श्रीकृष्ण भक्तोंके द्वारा अर्पित प्रेम-भक्ति-सुधा-रसका पान करते हैं। अग्‍निके मनमें उसीका स्वाद लेनेकी लालसा हो आयी। इसलिये उसने स्वयं ही मुखमें प्रवेश किया।

    २. विषाग्‍नि, मुंजाग्‍नि और दावाग्‍नि—तीनोंका पान करके भगवान्‌ने अपनी त्रितापनाशकी शक्ति व्यक्त की।

    ३. पहले रात्रिमें अग्‍निपान किया था, दूसरी बार दिनमें। भगवान् अपने भक्तजनोंका ताप हरनेके लिये सदा तत्पर रहते हैं।

    ४. पहली बार सबके सामने और दूसरी बार सबकी आँखें बंद कराके श्रीकृष्णने अग्‍निपान किया। इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् परोक्ष और अपरोक्ष दोनों ही प्रकारसे वे भक्तजनोंका हित करते हैं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 258)

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