श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

सान्द्रनीलाम्बुदैर्व्योम सविद्युत्स्तनयित्‍नुभिः।

अस्पष्टज्योतिराच्छन्‍नं ब्रह्मेव सगुणं बभौ॥ ४

sāndranīlāmbudairvyoma savidyutstanayitnubhiḥ|

aspaṣṭajyotirācchannaṃ brahmeva saguṇaṃ babhau|| 4

अर्थ

आकाशमें नीले और घने बादल घिर आते, बिजली कौंधने लगती, बार-बार गड़गड़ाहट सुनायी पड़ती; सूर्य, चन्द्रमा और तारे ढके रहते। इससे आकाशकी ऐसी शोभा होती, जैसे ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी गुणोंसे ढक जानेपर जीवकी होती है॥ ४॥✎ 1980 2078

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1980 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अपनी → अपने
  • #2078 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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