श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एवं ब्रुवति गोविन्दे नर्मणाऽऽक्षिप्तचेतसः।

आकण्ठम‌ग्‍नाः शीतोदे वेपमानास्तमब्रुवन्॥ १३

evaṃ bruvati govinde narmaṇā''kṣiptacetasaḥ|

ākaṇṭhamagnāḥ śītode vepamānāstamabruvan|| 13

अर्थ

जब भगवान्‌ने हँसी-हँसीमें यह बात कही तब उनके विनोदसे कुमारियोंका चित्त और भी उनकी ओर खिंच गया। वे ठंडे पानीमें कण्ठतक डूबी हुई थीं और उनका शरीर थर-थर काँप रहा था। उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—॥ १३॥✎ 1981

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1981 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ठंढे → ठंडे

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