श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मानयं भोः कृथास्त्वां तु नन्दगोपसुतं प्रियम्।

जानीमोऽङ्ग व्रजश्‍लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः॥ १४

mānayaṃ bhoḥ kṛthāstvāṃ tu nandagopasutaṃ priyam|

jānīmo'ṅga vrajaślāghyaṃ dehi vāsāṃsi vepitāḥ|| 14

अर्थ

‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम ऐसी अनीति मत करो। हम जानती हैं कि तुम नन्दबाबाके लाड़ले लाल हो। हमारे प्यारे हो। सारे व्रजवासी तुम्हारी सराहना करते रहते हैं। देखो, हम जाड़ेके मारे ठिठुर रही हैं। तुम हमें हमारे वस्त्र दे दो॥ १४॥✎ 1981

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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