श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

गत्वाथ पत्‍नीशालायां दृष्ट्वाऽऽसीनाः स्वलंकृताः।

नत्वा द्विजसतीर्गोपाः प्रश्रिता इदमब्रुवन्॥ १५

gatvātha patnīśālāyāṃ dṛṣṭvā''sīnāḥ svalaṃkṛtāḥ|

natvā dvijasatīrgopāḥ praśritā idamabruvan|| 15

अर्थ

अबकी बार ग्वालबाल पत्‍नीशालामें गये। वहाँ जाकर देखा तो ब्राह्मणोंकी पत्‍नियाँ सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और गहनोंसे सज-धजकर बैठी हैं। उन्होंने द्विजपत्‍नियोंको प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यह बात कही—॥ १५॥

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