श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

आत्मनाऽऽत्माश्रयः पूर्वं मायया ससृजे गुणान्।

तैरिदं सत्यसंकल्पः सृजस्यत्स्यवसीश्‍वरः॥ १३

ātmanā''tmāśrayaḥ pūrvaṃ māyayā sasṛje guṇān|

tairidaṃ satyasaṃkalpaḥ sṛjasyatsyavasīśvaraḥ|| 13

अर्थ

प्रभो! आप सबके अधिष्ठान और स्वयं अधिष्ठानरहित हैं। आपने सृष्टिके प्रारम्भमें अपनी मायासे ही गुणोंकी सृष्टि की और उन गुणोंको ही स्वीकार करके आप जगत‍्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करते रहते हैं। यह सब करनेके लिये आपको अपनेसे अतिरिक्त और किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् और सत्यसङ्कल्प हैं॥ १३॥✎ 1921 2093 2094

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि
  • #2093 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2094 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

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