श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

स त्वं भूधरभूतानां दैत्यप्रमथरक्षसाम्।

अवतीर्णो विनाशाय सेतूनां रक्षणाय च॥ १४

sa tvaṃ bhūdharabhūtānāṃ daityapramatharakṣasām|

avatīrṇo vināśāya setūnāṃ rakṣaṇāya ca|| 14

अर्थ

वही आप दैत्य, प्रमथ और राक्षसोंका, जिन्होंने आजकल राजाओंका वेष धारण कर रखा है, विनाश करनेके लिये तथा धर्मकी मर्यादाओंकी रक्षा करनेके लिये यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हैं॥ १४॥✎ 1921 2093 2094

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि
  • #2093 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2094 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

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