श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्।

ह्रियमाणः कालनद्या क्‍वचित्तरति कश्‍चन॥ ५

maivaṃ mamādhamasyāpi syādevācyutadarśanam|

hriyamāṇaḥ kālanadyā kvacittarati kaścana|| 5

अर्थ

परंतु नहीं, मुझ अधमको भी भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होंगे ही। क्योंकि जैसे नदीमें बहते हुए तिनके कभी-कभी इस पारसे उस पार लग जाते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहसे भी कहीं कोई इस संसारसागरको पार कर सकता है॥ ५॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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