श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

ममाद्यामंगलं नष्टं फलवांश्‍चैव मे भवः।

यन्‍नमस्ये भगवतो योगिध्येयाङ्‌घ्रिपंकजम्॥ ६

mamādyāmaṃgalaṃ naṣṭaṃ phalavāṃścaiva me bhavaḥ|

yannamasye bhagavato yogidhyeyāṅghripaṃkajam|| 6

अर्थ

अवश्य ही आज मेरे सारे अशुभ नष्ट हो गये। आज मेरा जन्म सफल हो गया। क्योंकि आज मैं भगवान्‌के उन चरणकमलोंमें साक्षात् नमस्कार करूँगा, जो बड़े-बड़े योगी-यतियोंके भी केवल ध्यानके ही विषय हैं॥ ६॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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