श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.64

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

अथ गोपीरनुज्ञाप्य यशोदां नन्दमेव च।

गोपानामन्त्र्य दाशार्हो यास्यन्‍नारुरुहे रथम्॥ ६४✎ 2104

atha gopīranujñāpya yaśodāṃ nandameva ca|

gopānāmantrya dāśārho yāsyannāruruhe ratham|| 64

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार कई महीनोंतक व्रजमें रहकर उद्धवजीने अब मथुरा जानेके लिये गोपियोंसे, नन्दबाबा और यशोदा मैयासे आज्ञा प्राप्त की। ग्वालबालोंसे विदा लेकर वहाँसे यात्रा करनेके लिये वे रथपर सवार हुए॥ ६४॥✎ 1678 1986

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1678 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आज्ञा-पालन → आज्ञापालन
  • #1986 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उन्हींकी → उन्हींके
  • #2104 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ दाशा → मन्त्र्य दाशा

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