॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.66
मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः।
वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥ ६६
manaso vṛttayo naḥ syuḥ kṛṣṇapādāmbujāśrayāḥ|
vāco'bhidhāyinīrnāmnāṃ kāyastatprahvaṇādiṣu|| 66
अर्थ
‘उद्धवजी! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक-एक वृत्ति, एक-एक संकल्प श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ही आश्रित रहे। उन्हींकी सेवाके लिये उठे और उन्हींमें लगी भी रहे। हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हींके नामोंका उच्चारण करती रहे और शरीर उन्हींको प्रणाम करने, उन्हींके आज्ञापालन और सेवामें लगा रहे॥ ६६॥✎ 1678 1986