अक्रूरजीने दूरसे ही देख लिया कि हमारे परम बन्धु मनुष्यलोकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आदि पधार रहे हैं। वे तुरंत उठकर आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया॥ १३॥✎ 1680
स तान् नरवरश्रेष्ठानाराद् वीक्ष्य स्वबान्धवान्।
प्रत्युत्थाय प्रमुदितः परिष्वज्याभ्यनन्दत॥ १३
अक्रूरजीने दूरसे ही देख लिया कि हमारे परम बन्धु मनुष्यलोकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आदि पधार रहे हैं। वे तुरंत उठकर आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 436) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)