॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.5.28
पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहृदो ह्यनुभावितः।
न तेषु क्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कल्पते॥ २८
puṃsastrivargo vihitaḥ suhṛdo hyanubhāvitaḥ|
na teṣu kliśyamāneṣu trivargo'rthāya kalpate|| 28
अर्थ
मनुष्यके लिये वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनोंको सुख मिले। जिनसे केवल अपनेको ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनोंको दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं’॥ २८॥