श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहृदो ह्यनुभावितः।

न तेषु क्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कल्पते॥ २८

puṃsastrivargo vihitaḥ suhṛdo hyanubhāvitaḥ|

na teṣu kliśyamāneṣu trivargo'rthāya kalpate|| 28

अर्थ

मनुष्यके लिये वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनोंको सुख मिले। जिनसे केवल अपनेको ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनोंको दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं’॥ २८॥

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