श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अथ सप्तमोऽध्यायः

शकट-भंजन और तृणावर्त-उद्धार

राजोवाच

येन येनावतारेण भगवान् हरिरीश्‍वरः।

करोति कर्णरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो॥ १

yena yenāvatāreṇa bhagavān harirīśvaraḥ|

karoti karṇaramyāṇi manojñāni ca naḥ prabho|| 1

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—प्रभो! सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि अनेकों अवतार धारण करके बहुत-सी सुन्दर एवं सुननेमें मधुर लीलाएँ करते हैं। वे सभी मेरे हृदयको बहुत प्रिय लगती हैं॥ १॥✎ 883

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #883 शब्दोंके बीचका स्थान: सर्वशक्तिमान्भगवान् → सर्वशक्तिमान् भगवान्

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