उनके श्रवणमात्रसे भगवत्-सम्बन्धी कथासे अरुचि और विविध विषयोंकी तृष्णा भाग जाती है। मनुष्यका अन्तःकरण शीघ्र-से-शीघ्र शुद्ध हो जाता है। भगवान्के चरणोंमें भक्ति और उनके भक्तजनोंसे प्रेम भी प्राप्त हो जाता है। यदि आप मुझे उनके श्रवणका अधिकारी समझते हों, तो भगवान्की उन्हीं मनोहर लीलाओंका वर्णन कीजिये॥ २॥✎ 883
यच्छृण्वतोऽपैत्यरतिर्वितृष्णा
सत्त्वं च शुद्ध्यत्यचिरेण पुंसः।
भक्तिर्हरौ तत्पुरुषे च सख्यं
तदेव हारं वद मन्यसे चेत्॥ २
उनके श्रवणमात्रसे भगवत्-सम्बन्धी कथासे अरुचि और विविध विषयोंकी तृष्णा भाग जाती है। मनुष्यका अन्तःकरण शीघ्र-से-शीघ्र शुद्ध हो जाता है। भगवान्के चरणोंमें भक्ति और उनके भक्तजनोंसे प्रेम भी प्राप्त हो जाता है। यदि आप मुझे उनके श्रवणका अधिकारी समझते हों, तो भगवान्की उन्हीं मनोहर लीलाओंका वर्णन कीजिये॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 162) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/7/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#883 शब्दोंके बीचका स्थान: सर्वशक्तिमान्भगवान् → सर्वशक्तिमान् भगवान्