श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

य एतस्मिन् महाभागाः प्रीतिं कुर्वन्ति मानवाः।

नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिवासुराः॥ १८

ya etasmin mahābhāgāḥ prītiṃ kurvanti mānavāḥ|

nārayo'bhibhavantyetān viṣṇupakṣānivāsurāḥ|| 18

अर्थ

जो मनुष्य तुम्हारे इस साँवले-सलोने शिशुसे प्रेम करते हैं। वे बड़े भाग्यवान् हैं। जैसे विष्णुभगवान्‌के करकमलोंकी छत्रछायामें रहनेवाले देवताओंको असुर नहीं जीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवालोंको भीतर या बाहर किसी भी प्रकारके शत्रु नहीं जीत सकते॥ १८॥

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