श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।

स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम्॥ २५

satsaṃgalabdhayā bhaktyā mayi māṃ sa upāsitā|

sa vai me darśitaṃ sadbhiraṃjasā vindate padam|| 25

अर्थ

भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्‍निध्यका अनुभव करता है। इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको—वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है॥ २५॥

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