जबतक परमात्माकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती रहती है, जबतक उनकी पालन-प्रवृत्ति बनी रहती है, तबतक जीवोंके कर्मभोगके लिये कारण-कार्यरूपसे अथवा पिता-पुत्रादिके रूपसे यह सृष्टिचक्र निरन्तर चलता रहता है॥ २०॥✎ 1922
सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः।
महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥ २०
जबतक परमात्माकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती रहती है, जबतक उनकी पालन-प्रवृत्ति बनी रहती है, तबतक जीवोंके कर्मभोगके लिये कारण-कार्यरूपसे अथवा पिता-पुत्रादिके रूपसे यह सृष्टिचक्र निरन्तर चलता रहता है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.24.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 865) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1922 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ब्रह्म-स्वरूप → ब्रह्मस्वरूप