श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.24.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः।

महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥ २०

sargaḥ pravartate tāvat paurvāparyeṇa nityaśaḥ|

mahān guṇavisargārthaḥ sthityanto yāvadīkṣaṇam|| 20

अर्थ

जबतक परमात्माकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती रहती है, जबतक उनकी पालन-प्रवृत्ति बनी रहती है, तबतक जीवोंके कर्मभोगके लिये कारण-कार्यरूपसे अथवा पिता-पुत्रादिके रूपसे यह सृष्टिचक्र निरन्तर चलता रहता है॥ २०॥✎ 1922

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1922 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ब्रह्म-स्वरूप → ब्रह्मस्वरूप

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