॥ श्रीहरिः ॥
स्वं स्वं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः।
अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ॥ ४८
svaṃ svaṃ parigrahaṃ sarve ādāya pitarau ca naḥ|
arjunenāvitāḥ sarva indraprasthaṃ gamiṣyatha|| 48
अर्थ
सब लोग अपनी-अपनी धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब और मेरे माता-पिताको लेकर अर्जुनके संरक्षणमें इन्द्रप्रस्थ चले जायँ॥ ४८॥✎ 907 1775
स्वं स्वं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः।
अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ॥ ४८
सब लोग अपनी-अपनी धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब और मेरे माता-पिताको लेकर अर्जुनके संरक्षणमें इन्द्रप्रस्थ चले जायँ॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 903) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्से
- #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज