दारुक! तुम मेरे द्वारा उपदिष्ट भागवतधर्मका आश्रय लो और ज्ञाननिष्ठ होकर सबकी उपेक्षा कर दो तथा इस दृश्यको मेरी मायाकी रचना समझकर शान्त हो जाओ’॥ ४९॥✎ 9071775
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचनामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥ ४९
दारुक! तुम मेरे द्वारा उपदिष्ट भागवतधर्मका आश्रय लो और ज्ञाननिष्ठ होकर सबकी उपेक्षा कर दो तथा इस दृश्यको मेरी मायाकी रचना समझकर शान्त हो जाओ’॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 903) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)