श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.48

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

शौनक उवाच

यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः।

चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्‍त्वा बन्धून्४ सुदुस्त्यजान्॥ ४८

yadāha no bhavān sūta kṣattā bhāgavatottamaḥ|

cacāra tīrthāni bhuvastyaktvā bandhūn sudustyajān|| 48

अर्थ

शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्‌के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्‍न तीर्थोंमें विचरण किया था॥ ४८॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—कृत्स्नं च दुस्त्यजम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 233)

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