श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.29

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यावत् सखा सख्युरिवेश ते कृतः

प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम्।

अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो

मा मे समुन्‍नद्धमदोऽजमानिनः॥ २९

yāvat sakhā sakhyuriveśa te kṛtaḥ

prajāvisarge vibhajāmi bho janam|

aviklavaste parikarmaṇi sthito

mā me samunnaddhamado'jamāninaḥ|| 29

अर्थ

प्रभो! आपने एक मित्रके समान हाथ पकड़कर मुझे अपना मित्र स्वीकार किया है। अतः जब मैं आपकी इस सेवा—सृष्टिरचनामें लगूँ और सावधानीसे पूर्वसृष्टिके गुण-कर्मानुसार जीवोंका विभाजन करने लगूँ, तब कहीं अपनेको जन्म-कर्मसे स्वतन्त्र मानकर प्रबल अभिमान न कर बैठूँ॥ २९॥

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