श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

स त्वं जिघांससे कस्माद्दीनामकृतकिल्बिषाम्।

अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः॥ १९

sa tvaṃ jighāṃsase kasmāddīnāmakṛtakilbiṣām|

ahaniṣyatkathaṃ yoṣāṃ dharmajña iti yo mataḥ|| 19

अर्थ

मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्रीका वध आप कैसे कर सकेंगे?॥ १९॥✎ 1329

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1329 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शरणा-गतवत्सल → शरणागतवत्सल

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