श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अपालितानादृता च भवद्भिर्लोकपालकैः।

चोरीभूतेऽथ लोकेऽहं यज्ञार्थेऽग्रसमोषधीः॥ ७

apālitānādṛtā ca bhavadbhirlokapālakaiḥ|

corībhūte'tha loke'haṃ yajñārthe'grasamoṣadhīḥ|| 7

अर्थ

लोकरक्षक! आप राजालोगोंने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरोंके समान हो गये हैं। इसीसे यज्ञके लिये ओषधियोंको मैंने अपनेमें छिपा लिया॥ ७॥

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