लोकरक्षक! आप राजालोगोंने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरोंके समान हो गये हैं। इसीसे यज्ञके लिये ओषधियोंको मैंने अपनेमें छिपा लिया॥ ७॥
अपालितानादृता च भवद्भिर्लोकपालकैः।
चोरीभूतेऽथ लोकेऽहं यज्ञार्थेऽग्रसमोषधीः॥ ७
लोकरक्षक! आप राजालोगोंने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरोंके समान हो गये हैं। इसीसे यज्ञके लिये ओषधियोंको मैंने अपनेमें छिपा लिया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 493) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/7/