श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते

सङ्कल्पनं विश्‍वसृजां पिपीपृहि।

ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं

प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि॥ ३८

sa tvaṃ vimṛśyāsya bhavaṃ prajāpate

saṅkalpanaṃ viśvasṛjāṃ pipīpṛhi|

aindrīṃ ca māyāmupadharmamātaraṃ

pracaṇḍapākhaṇḍapathaṃ prabho jahi|| 38

अर्थ

अतः प्रजापालक पृथुजी! अपने इस अवतारका उद्देश्य विचारकर आप भृगु आदि विश्‍वरचयिता मुनीश्‍वरोंका संकल्प पूर्ण कीजिये। यह प्रचण्ड पाखण्ड-पथरूप इन्द्रकी माया अधर्मकी जननी है। आप इसे नष्ट कर डालिये’॥ ३८॥

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