इसके पश्चात् जब वे यज्ञान्त स्नान करके निवृत्त हुए, तब उनके यज्ञोंसे तृप्त हुए देवताओंने उन्हें अभीष्ट वर दिये॥ ४०॥
कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे।
वरान्ददुस्ते वरदा ये तद्बर्हिषि तर्पिताः॥ ४०
इसके पश्चात् जब वे यज्ञान्त स्नान करके निवृत्त हुए, तब उनके यज्ञोंसे तृप्त हुए देवताओंने उन्हें अभीष्ट वर दिये॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/40/