॥ श्रीहरिः ॥
विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः।
आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः॥ ४१
viprāḥ satyāśiṣastuṣṭāḥ śraddhayā labdhadakṣiṇāḥ|
āśiṣo yuyujuḥ kṣattarādirājāya satkṛtāḥ|| 41
अर्थ
आदिराज पृथुने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दक्षिणाएँ दीं तथा ब्राह्मणोंने उनके सत्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अमोघ आशीर्वाद दिये॥ ४१॥
विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः।
आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः॥ ४१
आदिराज पृथुने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दक्षिणाएँ दीं तथा ब्राह्मणोंने उनके सत्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अमोघ आशीर्वाद दिये॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/41/